
देहरादून: उत्तराखंड में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के बाद अब धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर भी नई व्यवस्था लागू की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के अनुसार, पंजीकृत मदरसों में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के साथ दी जाने वाली धार्मिक शिक्षा के लिए भी पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है। सरकार का कहना है कि इस पाठ्यक्रम में नफरत, हिंसा और कट्टरता को बढ़ावा देने वाली शिक्षा के लिए कोई स्थान नहीं होगा।
बता दें कि,इससे पहले राज्य सरकार ने मदरसों में शुक्रवार के स्थान पर रविवार को साप्ताहिक अवकाश रखने का आदेश जारी किया था। अब धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में बदलाव को शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक और कदम बताया जा रहा है।
मदरसा बोर्ड की जगह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण
राज्य में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने के बाद उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया है। नई व्यवस्था के तहत मदरसों को निर्धारित शैक्षणिक मानकों और संबंधित विभागों के नियमों का पालन करना होगा। सरकार के मुताबिक, मदरसों में हिंदी, गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों की पढ़ाई भी अनिवार्य है…..सरकार की ओर से निर्धारित मानकों और मान्यता संबंधी शर्तों को पूरा नहीं करने वाले संस्थानों की मान्यता पर भी असर पड़ा है। इसी क्रम में राज्य के कई मदरसों के बंद होने की बात सामने आई है।
धार्मिक शिक्षा में प्रेम और सद्भाव पर जोर
उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, इस्लामिक धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम इस्लामिक विद्वानों की मदद से तैयार कराया गया है। उनका कहना है कि इसमें नफरत, हिंसा, कट्टरता और कटुता को बढ़ावा देने वाली शिक्षा का कोई स्थान नहीं है…प्राधिकरण की ओर से इस्लाम के साथ सिख, बौद्ध और जैन धर्मों की शिक्षा के लिए भी नए पाठ्यक्रम तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है।
अल्पसंख्यक विभाग के सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के मुताबिक, मुख्यमंत्री का दृष्टिकोण ऐसी धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा देना है, जिससे समाज में प्रेम, भाईचारा और सद्भाव मजबूत हो, न कि नफरत और हिंसा को बढ़ावा मिले।
देवबंदी पाठ्यक्रम पर उठे सवालों के बीच बदलाव
मदरसा शिक्षा को लेकर देश में समय-समय पर पाठ्यक्रम, आधुनिक शिक्षा और धार्मिक शिक्षण पद्धतियों पर बहस होती रही है। पूर्व राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने भी एक साक्षात्कार में मदरसों की शिक्षा व्यवस्था और देवबंदी निसाब को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा और व्यापक शैक्षणिक अवसरों की जरूरत पर जोर दिया था।हालांकि, किसी विशेष धार्मिक परंपरा या पूरे पाठ्यक्रम को नफरत और हिंसा से जोड़ने वाले दावों की पुष्टि के लिए संबंधित पाठ्यक्रम और उसके वास्तविक विषयों का स्वतंत्र परीक्षण जरूरी है। राज्य सरकार की मौजूदा पहल का घोषित उद्देश्य धार्मिक शिक्षा को निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाना और विद्यार्थियों को आधुनिक विषयों की शिक्षा से जोड़ना है।
क्या कहते हैं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, मदरसा बोर्ड समाप्त करने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया गया है। सभी संबंधित मदरसों को निर्धारित नियमों के अनुसार प्राधिकरण और उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। मदरसों में क्या पढ़ाया जाएगा, इसके लिए भी पाठ्यक्रम निर्धारित किए गए हैं।
मुख्यमंत्री का कहना है कि धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम विद्वान इस्लामिक स्कॉलर्स की मदद से तैयार किए गए हैं और इनमें हिंसा, नफरत तथा कट्टरवाद के लिए कोई स्थान नहीं है।उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य देवभूमि उत्तराखंड में ऐसी नई पीढ़ी तैयार करना है, जो प्रेम और सद्भाव का संदेश दे तथा राष्ट्रसेवा में अपना योगदान करे।
अब निगाहें नई व्यवस्था के क्रियान्वयन पर हैं। पाठ्यक्रम में बदलाव का वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि मदरसों में निर्धारित शैक्षणिक मानकों का पालन किस तरह होता है और विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा के साथ सामाजिक सद्भाव से जुड़ी शिक्षा कितनी प्रभावी ढंग से मिलती है।











