
देहरादून: उत्तराखंड में बदहाल सड़कों और मरम्मत कार्यों में लापरवाही को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सख्त रुख अपना लिया है। मुख्यमंत्री खुद सड़क मार्ग से पूरे प्रदेश का दौरा कर सड़कों की हकीकत परखेंगे। सड़कों की खराब स्थिति मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को सड़कों का स्थलीय निरीक्षण करने और लंबित मरम्मत कार्य तत्काल शुरू कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि विकास के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि सड़कों पर भी उनका असर दिखाई देना चाहिए।
सड़क निर्माण और मरम्मत की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी।
अब सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के इस सख्त रुख के बाद सड़कों की तस्वीर कितनी बदलती है और लापरवाह अधिकारियों पर कब कार्रवाई होती है।
बता दें कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मानसून सीजन खत्म होने से पहले ही सभी जिला अधिकारी और संबंधित लोक निर्माण विभाग जैसी कार्यदायी सस्थाओं को 15 अक्टूबर 2026 तक प्रदेश की सभी सड़कों में बारिश के कारण हुए गड्ढे भरने और मरम्मत कार्य की चेतावनी दी थी. लेकिन इस मूलभूत जनहित विषय पर संबंधित अधिकारियों के लापरवाही और हिलावली इतनी अधिक हो चुकी है कि उन पर मुख्यमंत्री के चेतावनी का असर भी नजर आया.इसके बाद इसकी डेडलाइन 18 अक्टूबर 2026 रख दी गई है.अब सारी हदें पार होने पर मुख्यमंत्री स्वयं सड़क पर उतरकर सड़कों के मरम्मत दुरुस्त कार्यों का जाएजा लेकर जवाबदेही तय करेंगे..
जब मुखिया की ही नहीं सुन रहे अफसर, तो जनता की फरियाद कौन सुनेगा?
जब सड़कों को दुरुस्त करने जैसे सीधे जनहित से जुड़े मुद्दे पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बार-बार सख्त निर्देशों के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं दिखता, तो यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर अधिकारी कितने बेलगाम हो गए हैं कि सरकार के मुखिया के निर्देशों का भी जमीन पर असर नजर नहीं आ रहा? जब मुख्यमंत्री की बार-बार की चेतावनी के बाद भी सड़कों की हालत नहीं सुधरती, तो आम जनता की शिकायतों को कितनी गंभीरता से सुना जाता होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। सवाल सिर्फ गड्ढों से भरी सड़कों का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था का भी है, जहां निर्देश तो जारी होते हैं, लेकिन उन पर अमल कराने की जिम्मेदारी निभाने में हीलाहवाली होती दिखाई देती है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री का सड़क मार्ग से प्रस्तावित दौरा इस सुस्त व्यवस्था को जगाता है या फिर सख्त निर्देश एक बार फिर फाइलों तक ही सिमटकर रह जाते हैं।











